
तेंदुआ खाल तस्करी का मामला, वन विभाग पर उठे सवाल
कवर्धा/कबीरधाम वनमंडल में तेंदुआ खाल जप्ती के मामले ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भले ही विभाग ने कार्रवाई कर 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया हो, लेकिन यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि क्षेत्र में लंबे समय से वन्यजीव तस्करी का नेटवर्क सक्रिय था और विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी।
वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, कवर्धा वनमंडल द्वारा 2 नग तेंदुआ खाल, हड्डी और नाखून जैसी सामग्री जप्त की गई है। यह कार्रवाई वाइल्ड लाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो भोपाल और राज्य स्तरीय उड़नदस्ता दल रायपुर से मिली सूचना के बाद की गई।
यानी साफ है कि स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र कमजोर रहा और बाहरी एजेंसियों के इनपुट के बाद ही वन विभाग हरकत में आया।
कार्रवाई तरेगांव क्षेत्र के ग्राम गुडली और कवर्धा परिक्षेत्र के ग्राम चोरभट्टी में की गई, जहां से 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में आरोपियों ने तेंदुआ खाल का उपयोग पूजा-पाठ और तांत्रिक गतिविधियों में करने की बात स्वीकार की है।
बड़ा सवाल…
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर वन्यजीवों का शिकार और उनकी खाल का अवैध कारोबार कब से चल रहा था? क्या वन विभाग की नियमित गश्त और खुफिया तंत्र पूरी तरह फेल हो चुका है?
अगर समय रहते सूचना नहीं मिलती, तो यह नेटवर्क और बड़ा रूप ले सकता था।
फिलहाल 5 आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए हैं और वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत कार्रवाई की जा रही है, लेकिन इस घटना ने वन विभाग की सतर्कता और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।



